साहित्य

हरिगीतिका छंद में लाल का माँ से चाँद संवाद

डॉ मंजु गुप्ता

है चाँद आया आज छत पै , पूछ घट बढ़ राज माँ।

 

छूना मुझे अब चाँद मामा , खेल का यह साज माँ।।

 

तू गोद से मुझको उछालो , व्योम पर छू लूँ उसे।

 

जिद ठान ली है लाल ने जो , भूमि पर लाना इसे।।

 

 

 

बिट्टू ! गया है चाँद माँ घर , मौज मस्ती घूमने।

 

ईमेल अब उसको किया है , लौट आ सुत चूमने।।

 

माँ! रातभर सोया नहीं मैं , दृष्टि चंदा ओर थी ।

 

थी रात्रि तारे गिन कटी माँ! , हो गयी नव भोर थी ।।

 

 

 

सीढ़ी लगा के छू उसे लूँ , संग उसके घूमना।

 

है आत्मबल विश्वास मुझ में , प्रश्न मुझको पूछना।।

 

जन चौथ चंदा ईद पूजें , तोड़ते व्रत सामने।

 

की पूर्ण इसरो ने वही जिद , चाँद को है जानने।।

 

डॉ मंजु गुप्ता

 

वाशी , नवीमुम्बई, महाराष्ट्र

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