
दो जून की मिले जब रोटी, आज की मंहगाई में।
चाहत इतनी सी है मेरी, मिल जाए ॲंगनाई में।।
कर रहे अभी संघर्ष सभी, मुफलिसी के दौर में।
मंहगाई की बातें हुईं, जन बटे सब जोर में।।
दिन रात सभी गिनती करते, बैठे सब अमराई में।
दो जून की मिले जब रोटी, आज की मंहगाई में।।
खेतों में करते काम कृषक, फसल सब उगाता है।
मेहनत कश लोगों को कभी, फिर भी मिल पाता है। फसल बाजार में रकम लगे , तब हीउतराई में।
दो जून की मिले जब रोटी, आज की मंहगाई में।।
मौसम जब बदले फसल हुईं, खराब तब चुप रहते।
श्रम पर करें भरोसा तब भी, शांति जीवन जीते।
मार मौसम की सहन करते, ,कर्जा गहराई में।
दो जून की मिले जब रोटी, आज की मंहगाई में।।
दो जून की मिले जब रोटी, आज की मंहगाई में।
चाहत इतनी सी है मेरी, मिल जाए अंगनाई में।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश
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