साहित्य

ग़ज़ल

डॉ.मुश्ताक़

जिसकी ख़ुशबू से महकती है मरी ज़ात अब भी,

मेरी पोरों में उसी लम्स की थकन आज भी है।

 

देख कर मुझको वो शरमा के पलटना उसका,

याद मुझको वो हया का  वो मंज़र आज भी है।

 

बेरुख़ी से वो जलाता है मिरा दिल लेकिन,

उसके लहज़े में चाहत की तड़प आज भी है।

 

वक़्त की धूल ने चेहरे तो बदल दिए सारे,देखो,

दिल की गहराई में यादों  की चमक आज भी है।

 

जाने किस मोड़ पे बिछड़ा था वो हमसफ़र मेरा,

सूनी राहों में उसी पायल की छनक आज भी है

 

इश्क़ की राह में बर्बाद  हुए है,हम फिर भी,

दिल-ए मुश्ताक़ में मगर बेकरारी आज भी है

 

ग़ज़ल

डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

हरदा मध्य प्रदेश

 

जुदाई का मंज़र, वो रुलाती हुई रात नहीं भूले,

इश्क़ में हारा हुआ दिल,अभी कल की बात है।

 

उरूज पर हमारी दास्तान-ए-इश्क़ थी अपनी,

अब तो  माजी का सफ़र, जो कल की बात है।

 

तेरा मिलना, वो हंसना, वो नज़रें झुका लेना,

ख़्वाब जैसा वो समां, अभी कल की बात है।

 

सारी दुनिया से लड़े थे हम जिस शख़्स के लिए,

उसका यूँ मुँह फेर लेना,अभी कल की बात है।

 

रोशन  हो गई थी क़ायनात  कभी ये अपनी,

तेरा वो मुझसे मिलना, अभी कल की बात है।

 

कहते हैं ज़माना बीत गया इसको मुश्ताक़,

मेरा दिल तो  कहता है,अभी कल की बात है।

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