आलेख

प्रकृति का क्रंदन: एक आत्मचिंतन

डो. दक्षा जोशी'निर्झरा'

µविश्व पर्यावरण दिवस महज़ एक रस्म नहीं, हमारी चेतना के झरोखे पर टंगा एक सुलगता हुआ सवाल है। कंक्रीट के जंगलों को सींचते हुए हमने उस हरी-भरी कोख को उजाड़ दिया, जिसने हमें जीवन दिया। नदियाँ अब पानी नहीं, हमारी अंधी प्रगति का आंसुओं भरा ज़हर ढो रही हैं, और हवाएं हर सांस के साथ मौत का मर्सिया पढ़ रही हैं।
हम विकास की जिस अंधी दौड़ में दौड़ रहे हैं, उसका अंत विनाश की गहरी खाई में होता है। पृथ्वी का बढ़ता तापमान दरअसल उसकी तड़प और बुखार है। प्रकृति हमसे कोई बदला नहीं ले रही, वह तो बस अपना संतुलन ख़ोज रही है।
क्या हम इतने दरिद्र हो चुके हैं कि आने वाली नस्लों को विरासत में सिर्फ़ प्लास्टिक के पहाड़ और प्रदूषित सांसें सौंपेंगे?
आज ज़रूरी है कि हम इस सूक्ष्म विनाश को अपनी संवेदनशील आँखों से देखें। जब तक़ पर्यावरण का संरक्षण हमारे कैलेंडर की तारीखों से निकलकर हमारे रोज़मर्रा के संकल्पों और धड़कनों में शामिल नहीं होगा, तब तक़ हर उत्सव बेमानी है। लौटिए अपनी जड़ों की ओर, क्योंकि प्रकृति बचेगी, तभी हम बचेंगे।
-डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।

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