
जिन पर हम जान लुटा कर बैठ गए
वो तो हमसे आंँख चुरा कर बैठ गए।
दुश्मन जितना उड़ाना चाहे उड़ने दो
हम भी सारे जाल बिछाकर बैठ गए ।
कैसे पार नहीं जाएगी नाव मेरी।
हम दरिया से आंँख मिलाकर बैठ गए।।
पीठ पर खंजर उसने ही तो मार दिया
जिसको अपना राज बताकर बैठ गए ।
उनके बच्चे दर-दर भटकेंगे इक दिन
जो दूजे का हिस्सा खाकर बैठ गए।



