साहित्य

विश्व ही परिवार है”

सुषमा श्रीवास्तव

çवसुधैव कुटुम्बकम्’ एक प्राचीन भारतीय संकल्पना है, जिसका अर्थ है “संपूर्ण विश्व एक परिवार है” यह आदर्श वाक्य भारत की सदियों पुरानी संस्कृति का मूल है और सार्वभौमिक भाईचारे, सहिष्णुता, और वैश्विक शांति का संदेश देता है। यह शांतिपूर्ण और एकजुट दुनिया का निर्माण करने की प्रेरणा देता है।

*उत्पत्ति और अर्थ-:

यह संस्कृत वाक्यांश “वसुधा एव कुटुम्बकम्” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है— पृथ्वी (वसुधा) ही परिवार है।इसकी उत्पत्ति उपनिषदों, विशेष रूप से महा उपनिषद के छठे अध्याय में हुई है :-

“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”

अर्थ: ‘यह अपना है या पराया, ऐसी सोच संकुचित मन वाले लोग रखते हैं। इसके विपरीत, उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो संपूर्ण पृथ्वी ही उनका परिवार होती है।’

*दार्शनिक महत्व :-

जाति-पाति और सीमाओं से परे:-

यह विचार किसी देश, धर्म या नस्ल तक सीमित नहीं है। यह हमें सिखाता है कि पूरी मानवता और सभी जीव-जंतु आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।

*पर्यावरण और प्रकृति प्रेम:-

इस अवधारणा में केवल मानव ही नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रकृति (पेड़-पौधे, नदियाँ और जीव) शामिल हैं। यह पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाती है।

*वर्तमान समय में प्रासंगिकता:-

आज की वैश्वीकृत दुनिया में, जहांँ देश, जलवायु परिवर्तन, महामारी, और संघर्षों से जूझ रहे हैं, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।यह सिद्धांत विभिन्न देशों के बीच सहयोग, साझा विकास और आपसी सम्मान की वकालत करता है।

आधुनिक संदर्भ में इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण वैश्विक मंचों पर देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए – भारत ने अपनी जी-20 की अध्यक्षता के दौरान “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” (One Earth, One Family, One Future) का आदर्श वाक्य इसी दर्शन से प्रेरित होकर दिया था।

*निष्कर्ष:-

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल एक श्लोक या नारा नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। जब हम पूरी दुनिया को अपने परिवार के रूप में देखेंगे तो घृणा, स्वार्थ और युद्ध जैसी समस्याएंँ समाप्त हो सकती हैं। यह एक ऐसी समावेशी दुनिया का निर्माण करता है, जहाँ सभी लोग शांति और सद्भाव के साथ रह सकते हैं।

 

लेखिका –

सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।

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