
से पार क्षितिज के उस छोर,
कौन बुलाता मुझको नीरव भोर?
नीली लहरों पर स्वर्णिम छाया,
ज्यों सपनों का मधुमय आलोक-डोर।
अंबर ने फैला दी बाहें अपनी,
जल ने ओढ़ी चादर रजत सपनी,
लहरों के अधरों पर थरथराती,
मौन विरह की वीणा के स्वर,
खोज रहा उस सीमा का संगीत,
सागर की गहराई, नभ की ऊँचाई,
दोनों में एक रहस्य समाई,
क्षितिज नहीं केवल दूरी का बंधन,
वह तो आशा की अमर तरुणाई,
सागर से पार क्षितिज मुस्काता,
अज्ञात लोक का संदेश सुनाता,
जो बढ़ता है स्वप्नों के सहारे,
वही जीवन का सत्य है पाता ||
*शशि कांत श्रीवास्तव*
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब




