साहित्य

अनकहा सत्य

डॉ० सारिका ठाकुर '

क्या सचमुच हर हँसी के पीछे उजियारा ही बसता है,

या भीतरी अँधियारा भी अधरों पर दीपक धरता है।

 

क्या सचमुच हर चुप्पी केवल शब्दों का अभाव भर है,

या वह पीड़ा का वह निर्झर है, जो भीतर ही भीतर बहता है।

 

क्या सचमुच रिश्ते केवल परिचय के धागों से बँधते हैं,

या कुछ आत्मिक स्पर्श बिना नाम के भी जीवन में बसते हैं।

 

क्या सचमुच बिछुड़ जाना ही हर कहानी का अंतिम छोर है,

या स्मृतियों का मौन आलोक ही संबंधों का सच्चा ठौर है।

 

क्या सचमुच हर प्रश्न का उत्तर मिल जाना ही समाधान है,

या कुछ अधूरेपन में ही मनुष्य होने का गूढ़ विधान है।

 

नहीं, हर सत्य शोर नहीं करता, कुछ मौन में आकार लेते हैं,

और कुछ “अनकहे सत्य” जीवन भर।केवल हृदय में उतरते हैं।

 

©® डॉ० सारिका ठाकुर ‘जागृति’

ग्वालियर (मध्य प्रदेश )

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