
र्मातक मंजर देख, हर आँख लहू से रोती है,
जब मासूमों पर ब्रजपात हो, उम्मीदें जिंदा खोती है।
दिल की कसक तड़पाती है, जो भीतर ही रह जाती है,
सपनों की छिनभिन्न हो काया, रुह को रोज कपाती है।
शिक्षा का मंदिर देखो, पल में शमशान हुआ,
जहां गूंज थी विद्या की, वहां मातम का तांडव हुआ।
चाहू और मची चीखे रुदन, इस धरा को खूब रुलाती है,
बुझ गए जो घर के वो चिराग, उनका दर्द बहुत तड़पाती है।
सिसक रही लखनऊ नगरी, हर दिल आज रोता है,
15 मासूमो की मौत यहां, एक कहानी कहता है।
बेबस मां-बाप की चीखों का, थमता न कोई शोर यहां,
चंद पैसों की खातिर देखो, मचा बड़ा अंधघोर यहां।
निर्लज खड़े जो मालिक हैं, जो शिक्षा का व्यापार करें,
मासूमो की जान से खेल कर, अपनी बस जैब भरे।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




