
द पर टुकड़े बादलों के,
तिर रहे हैं कुछ यूँ,
कागज पे कूची ,
चला रहा हो बच्चा।
तारे आसमान में यूँ,
बिखरे पड़े हैं,
कूची झटक के छींटे,
उड़ा रहा हो बच्चा।
ढुलका के प्यालियांँ,
ढेर सी रंग भरी,
मानो चाँद-कागज़,
छिपा रहा हो बच्चा।
आड़ी हो या तिरछी,
जैसी भी बने तस्वीर
तस्वीर बना के रहेगा,
ज़िदिया रहा हो बच्चा।
झाँका किरनों ने ,
पूरब की खोल खिड़की,
सुरमई-किरमिजी पौ पे,
ललचा रहा हो बच्चा।
महक उड़ी गुलों की,
तितलियॉं आ गईं,
पंछी की चहक में,
खिलखिला रहा हो बच्चा।
ओस भीगी पंखुरियांँ,
मोती बन चमक उठीं,
थाम माँ का आंँचल,
शरमा रहा हो बच्चा।
मंजीरे सुबह के
बजने लगे हैं अब
देख करतब अपने,
गुनगुना रहा हो बच्चा।
टुकड़े बादलों के,
चाँद पर तैर रहे हैं यूँ,
काग़ज पर कूची ,
चला रहा हो बच्चा।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




