
कल आज और कल की परिधि में,
टिका हुआ है सबका जीवन।
गत की सोच में कल की खोज में,
बीत न जाए आज का शुभ दिन।
जैसी करनी वैसी भरनी,
दुनियाँ भर ये तो सब जाने।
फिर भी करते हैं भूल खूब सारी,
पग-पग, हर दिन जाने अनजाने।
है न कोई भरोसा कल का,
आज ही है बस खास तेरा सुन।
कौन जाने कब होंगे प्यारे काल का,
जीयो हर पल मौलिक जीवन।
सच्ची राह पर रहो चलते,
कभी न होगी जिंदगी अधूरी।
अंतरात्मा की पुकार रहो सुनते,
जन्म भर बनो नेकी की प्रहरी।
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*©® ✍ डॉ. अनुराधा डेनमार्क



