साहित्य

गज़ल

ममता झा मेधा 

*गज़ल*

*बहर*-222—222—22

*काफिया*: अर

*रदीफ*: देखो

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थोड़ा तो मुस्काकर देखो,

पलक बिछीं हैं आकर देखो।।

 

दिल पर कोई धूप नहीं है,

दर्द – छाँव मिटाकर देखो।

 

नैया उमर पुरानी है पर,

इसको आप चलाकर देखो।

 

जख्म बहुत हैं सीने में पर,

मरहम-इश्क लगाकर देखो।

 

तेरी गलियों में घूमें हम ,

मेरे दर परआकर देखो।

 

ख्वाब अधूरे टूट गए जो,

उनको आप सजाकर देखो।

 

हर बार कहे ममता थक कर,

खुद को भी अजमाकर देखो।।

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ममता झा मेधा

डालटेनगंज

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