
*गज़ल*
*बहर*-222—222—22
*काफिया*: अर
*रदीफ*: देखो
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थोड़ा तो मुस्काकर देखो,
पलक बिछीं हैं आकर देखो।।
दिल पर कोई धूप नहीं है,
दर्द – छाँव मिटाकर देखो।
नैया उमर पुरानी है पर,
इसको आप चलाकर देखो।
जख्म बहुत हैं सीने में पर,
मरहम-इश्क लगाकर देखो।
तेरी गलियों में घूमें हम ,
मेरे दर परआकर देखो।
ख्वाब अधूरे टूट गए जो,
उनको आप सजाकर देखो।
हर बार कहे ममता थक कर,
खुद को भी अजमाकर देखो।।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज




