
बचपन से हमारे झाबुआ आदिवासी पिछड़े अंचल के इस अद्भुत पेड़ से पत्ते से प्यार रहा, यह वह पेड़ है जो कितनी ही चिलचिलाती धूप हो सदा ही हरा भरा प्यारा मासूम सा लगता हुआ मन को मोहित कर लेता है यह, पड़े के पत्ते है जो झाबुआ के पकवान में पानियां नाम से इस पत्ते से बनाए जाते है और यह मक्की की रोटी का बाटी आकार में इस पत्ते पर रख सेक कर
घी लगा दिया जाता है जो देश और दुनिया में चर्चित है, करोड़ो को सुखद सुकून देने वाला, उनकी भूख को शांत कर उन्हें आनन्दित करने वाला यह खाखरे का पत्ता , कितनी चिलचिलाती धूप में,सुन्दन हरा भरा प्यारा सा जीवंत सजीव दिखाई देता है कि अच्छे अच्छे चौक जाते हैं, सचमुच बहुत अद्भुत सहन शक्ति है इस ईश्वरीय पेड़ में , सारी आंधी तूफान, आग सी धूप को सहन करता हुआ जीता है और के सुख सुकून के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया मेरे जीवन में सदा के लिए आज उसी पते के दर्द को याद कर रहा बैठा था उसके सिरहाने और बात कर रहा था उससे, मैं भी तुम्हारा जैसा हो गया हूं सारी धूप और जीवन की आंधी तूफान को सहन कर जी रहा हूं आज अपनों के लिए देश और दुनिया को चौका देने वाला सुख सुकून बांट कर ही राहत महसूस कर रहा हूं, मैं सदा ही तुम्हारी तरह कोई शिकायत नहीं की चुपचाप सदा ही तुम्हारी कोमलता लिए मुस्कान समेटे सभी को अच्छा लगे इसी में लगा रहा , वह मुस्कान लिए मेरी और ध्यान से देखने लगा और मेरे गाल से , बालों से खिलने लगा और भूल गया अपना सब दर्द को में भी उसकी कोमलता में नाज़ुक खूबसूरती को निहारता खो जाता हूं अजीब सुख सुकून में चलों आज किसी अपने से मुलाकात हुई और ईश्वर को प्रणाम करता हूं कि कौन कोई और भी है मेरे तरह, जैसे तुम ने रूह प्रेम उपहार दिया ठीक वैसा ही यह भी है ईश्वर सचमुच धन्य है तू मेरा ख्याल कितना है तुझे आज तूने मुझे एक और अपने साथी से मिला दिया और यह सोचते हुए बहुत प्यार से उस मासूम छवि मोहक छवि लिए खाखरे के पत्ते को निहारता चल दिया उसे दिल और दिमाग में सदा के लिए बैठा कर प्रसन्न हो जीने के लिए बहुत कुछ और सुख सुकून बांटने में,,,
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्यप्रदेश भारत




