
आजकल राजनीति में विचारधाराओं से ज्यादा चर्चा “मेलोडी गिफ्ट” की हो रही है। जैसे ही इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और नरेन्द्र मोदी की किसी मुलाकात की तस्वीर सामने आती है, सोशल मीडिया पर “मेलोडी” का ऑर्केस्ट्रा शुरू हो जाता है।
लोग सोच रहे हैं कि आखिर इस “मेलोडी गिफ्ट” में ऐसा क्या है कि कूटनीति भी वायरल हो रही है। पहले देशों के बीच समझौते, व्यापार और रणनीति की चर्चा होती थी। अब मीम विशेषज्ञ यह विश्लेषण कर रहे हैं कि मुस्कान कितनी थी, कैमरा किस एंगल से था और सोशल मीडिया पोस्ट में कितने इमोजी थे!
विपक्ष भी परेशान है। उसे लगता है कि यह कोई साधारण कूटनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि ऐसा “गिफ्ट पैक” है जिसने मीडिया की आधी सुर्खियाँ अपने नाम कर ली हैं। उधर समर्थक इसे भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रतीक बताते हैं।
राहुल गांधी का नाम भी इस बहस में आ ही जाता है। राजनीतिक गलियारों में मजाक उड़ाया जाता है कि यदि किसी दिन मौसम विभाग भी धूप निकलने की घोषणा कर दे, तो कुछ लोग पूछ बैठेंगे—”इसमें मोदी का क्या रोल है?” विरोधियों का आरोप है कि हर चर्चा का केंद्र मोदी क्यों हैं, जबकि समर्थकों का जवाब है कि चर्चा का केंद्र वही होता है जो खबरों में रहता है।
“मेलोडी गिफ्ट” अब एक प्रतीक बन गया है। कोई इसे कूटनीतिक मित्रता कहता है, कोई सोशल मीडिया की रचनात्मकता और कोई राजनीतिक मार्केटिंग की सफलता। लेकिन सबसे ज्यादा आनंद तो मीम बनाने वालों को आ रहा है। वे हर तस्वीर को ऐसा प्रस्तुत करते हैं मानो संयुक्त राष्ट्र नहीं, बल्कि किसी कॉलेज का फ्रेशर्स डे चल रहा हो।
जनता भी कम समझदार नहीं है। वह जानती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल मुस्कानों और तस्वीरों से नहीं चलते, लेकिन यह भी सच है कि राजनीति में प्रतीकों की अपनी ताकत होती है। एक तस्वीर कई बार हजार भाषणों पर भारी पड़ जाती है।
अब हालत यह है कि “मेलोडी गिफ्ट” सुनते ही लोगों को चॉकलेट, मिठाई या उपहार नहीं, बल्कि कूटनीति, कैमिस्ट्री और सोशल मीडिया की तिकड़ी याद आ जाती है।
अंततः राजनीति का यह नया सूत्र बन गया है
“पहले नेता घोषणाओं से चर्चा में आते थे,
अब कभी-कभी एक फोटो और एक गिफ्ट ही पूरी राजनीति को ‘मेलोडी’ बना देता है!”




