बड़ी मुश्किल से मिलती है, दो जून की रोटी,
गरीब की आँखों में पलती है, दो जून की रोटी।
कोई दिनभर धूप में जलता, तब घर लेकर आता,
फिर भी आधा पेट ही भरती है, दो जून की रोटी।
कोई खेतों में पसीना बहाकर फसल उगाता,
फिर भी किस्मत से हारती है, दो जून की रोटी।
कोई रिक्शा खींच-खींचकर सड़कों पर थक जाता,
तब जाकर चूल्हे में पकती है, दो जून की रोटी।
माँ अपने बच्चों की खातिर भूखी सो जाती,
ममता बनकर ही सजती है, दो जून की रोटी।
बाप फटे हुए कपड़ों में भी हँसता रहता है,
घर की उम्मीदों में बसती है, दो जून की रोटी।
किसी अमीर की थाली में बच-बच कर फेंकी जाती,
किसी गरीब की किस्मत लगती है, दो जून की रोटी।
कोई विरासत में पाता है महलों की ऊँचाई,
कोई किस्मत से लड़ती है, दो जून की रोटी।
मजदूरों की टूटी सांसों का यही सहारा है,
हर आँसू में भीगती रहती है, दो जून की रोटी।
जिसने भूख की आग सही, वही इसका मोल समझे,
वरना सबको आसान लगती है, दो जून की रोटी।
मत ठुकराना किसी भूखे को अपने दरवाज़े से,
बड़ी दुआओं से मिलती है, दो जून की रोटी।
सीता सर्वेश त्रिवेदी जलालाबाद शाहजहांपुर



