साहित्य

महाकाल का जवाब

ज्योति बरनवाल 

 

मैं क्या करूँ? कैसे समझाऊँ,

अपने इस मन की पीड़ा को?

कोई उपाय तो इस दर्द को मिटाए,

इस डूबते भरोसे को पार लगाए।

 

यह दुनिया तो बस मतलब की है,

जले पर नमक छिड़कने वाली है।

पर एक ही दरबार (महाकाल) है ऐसा,

जहाँ मैं अपना सब कुछ सौंप कर आई हूँ।

 

अपनी चिट्ठी मैं वहीं छोड़ आई हूँ,

मन में विश्वास है, उनका जवाब आएगा।

मेरे इस जीवन पर, मेरे इस आँगन पर,

जल्द ही वो निवारण करेंगे।

 

मेरे दुखों का यह पतझड़ उड़ जाएगा,

जीवन में नई शाखाएं, नई उम्मीदें लौटेंगी।

वो चूक नहीं, वो चिट्ठी मेरी…

एक दिन महाकाल का जवाब बनकर आएगी।

 

वो जवाब मेरे नाम होगा,

मेरी खुशियाँ फिर लौट कर आएंगी,

हाँ, मेरी खुशियाँ फिर लौट कर आएंगी!

 

  1. ज्योति बरनवाल

नवादा (बिहार)

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