साहित्य

मुफ़्त का मोल और ज़िंदगी की मुश्किलें’

डो.दक्षा जोशी

ज़िंदगी का मुश्किल होना कोई अभिशाप नहीं, बल्कि मानवीय फितरत को सुधारने का एक नियम है। इंसान की यह कमज़ोरी है कि वह बिना संघर्ष या मुफ़्त में मिली चीज़ों का मूल्य नहीं समझता। चाहे वह मुफ़्त में मिलने वाली साँसें हों, अपनों का निश्छल प्रेम हो या बिना माँगे मिली सुख-सुविधाएँ,हम अक़्सर उनकी अहमियत भूल जाते हैं।जो धूप में नहीं जला, वह छाँव की शीतलता को कभी नहीं महसूस कर सकता।यदि हर मंज़िल और ख़ुशी आसानी से मिल जाए, तो जीवन से कद्र और कृतज्ञता का भाव ही समाप्त हो जाएगा। कठिनाइयाँ और ठोकरें हमें तोड़ती नहीं, बल्कि तराशकर पत्थर से भगवान बनाती हैं। संघर्ष ही वस्तुओं और रिश्तों को ‘अनमोल’ बनाता है। अतः, ज़िंदगी इसलिए कठिन है ताकि हम हर छोटी नियामत की सही कीमत जान सकें और इंसान बने रहें।

यह ज़िंदगी मुश्किल इसलिए नहीं है कि हमें सताना चाहती है, बल्कि इसलिए है ताकि जब हमें मंज़िल मिले, तो हम उसकी कद्र करना सीखें। मुफ़्त में मिली हवाओं की क़ीमत अक़्सर वेंटिलेटर पर समझ आती है, और मुफ़्त के रिश्तों की क़ीमत उनके चले जाने के बाद। मुश्किलों का शुक्रिया, जो वो चीज़ों को ‘अनमोल’ बनाए रखती हैं।

-डो.दक्षा जोशी ‘निर्झरा’

अहमदाबाद, गुजरात।

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