साहित्य

ताल / डैम / जलाशय अनमोल धरोहर* (“जल ही जीवन है” ) 

डॉ अनमोल कुमार

ताल – गाँव का आईना

चुपचाप लेटा गाँव का ताल,

आसमान को देता हर शाम।

बूढ़े बरगद की परछाई,

बच्चों की किलकारी, पनघट की तरुणाई।

 

भैंसें नहातीं, पनिहारिनें गातीं,

कमल खिलते, मछलियाँ इठलातीं।

सूखे में सबकी प्यास बुझाता,

ताल नहीं, गाँव का देवता कहलाता।

 

2. डैम – पहाड़ों का संकल्प

चट्टानों का सीना चीर कर खड़ा,

नदी की राह में सीना तान अड़ा।

कंक्रीट का तपस्वी, युगों से मौन,

बिजली बनाता, खेतों को देता कौन?

 

भाखड़ा, टिहरी, हीराकुड नाम,

प्रगति की धारा, भारत की शान।

पर डूबे गाँव, डूबे खेत,

विस्थापन की टीस, कैसा है ये हेत?

डैम कहता – “विकास की कीमत चुकाओ,

पर पुनर्वास का धर्म निभाओ।”_

 

जलाशय – धरती का कलश

बरसात की बूँदें जब मचलतीं,

नदियाँ उफनकर जब संभलतीं,

तब जन्म लेता है जलाशय,

धरती माँ का अमृत-कलश।

 

गर्मी में जब धरती जलती,

यही बूँद-बूँद जीवन पलती।

प्रवासी पंछी इसे तीर्थ मानें,

जलाशय बचाओ, कल बचाओ – ये सब जानें।

 

समापन

ताल कहे – “मैं संस्कृति हूँ”,

डैम कहे – “मैं शक्ति हूँ”,

जलाशय कहे – “मैं भविष्य हूँ”।

तीनों मिलकर बोले

“हमें बाँधो नहीं, अपनाओ,

गाद से बचाओ, प्लास्टिक हटाओ।

क्योंकि बूँद-बूँद से ही सागर भरता,

जल बचेगा तभी जीवन पनपता।”

 

 

 

लाइन का सार

ताल गाँव की जान है, डैम देश की शान है,

जलाशय आने वाले कल का वरदान है।

इन्हें सहेजो, इन्हें सँवारो,

जल के बिना सूना संसार है।”

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