
*प्रेस विज्ञप्ति*
*झांसी \ फिल्लौरी जी ने ॐ जय जगदीश हरे आरती को हर घर हर मंदिर में पहुँचाने का काम किया- प्रो. पुनीत बिसारिया*
*फिल्लौरी जी की पुण्यतिथि पर उनकी स्मृति में कवि गोष्ठी का हिन्दी विभाग में हुआ आयोजन*
झाँसी। पण्डित श्रद्धाराम शर्मा फ़िल्लौरी जी ने ॐ जय जगदीश हरे जैसी कालजयी आरती को देश विदेश में बसे करोड़ों भारतीयों के हृदयों, घरों और मंदिरों में पहुँचाकर भक्ति की परम्परा को नूतन आयाम देने का कार्य किया। इस आरती के बगैर सनातन धर्म का कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं होता। ये उद्गार आज बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, कला संकाय, आचार्य एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग प्रो पुनीत विसारिया ने व्यक्त किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि पण्डित श्रद्धाराम फिल्लौरी जी ने हिन्दी का पहला लिखित उपन्यास भाग्यवती लिखकर आगे के उपन्यासकारों का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने ये उद्गार ॐ जय जगदीश हरे जैसी प्रार्थना के अमर रचयिता एवं हिन्दी के प्रथम लिखित उपन्यास भाग्यवती के लेखक पण्डित श्रृद्धाराम फिल्लौरी जी के 140वें स्मृति दिवस के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी तथा कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए।
कवि सम्मेलन में मुख्य अतिथि डॉ० उमाशंकर खरे उमेश पृथ्वीपुर निवाड़ी का सारस्वत सम्मान प्रो पुनीत बिसारिया द्वारा किया गया ।
इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन में कवियों ने एक से बढ़कर एक कविताएँ सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इससे पूर्व डॉ मुहम्मद नईम ने अतिथियों का स्वागत किया।
डॉ ब्रजलता मिश्रा ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत करते हुए कहा-
शारदा हेरो मेरी ओर
निशदिन ध्यान धरत हैं मन में
जैसे चाँद चकोर।
संचालक डॉ० राजेश तिवारी मक्खन ने वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान को नमन करते हुए कुछ यूँ कहा-
अंग्रेजों के आगे आ गई धर रूप दुर्गा काली।
बाईसाब झाँसी वाली।
सपने बबेले ने कहा-
रे मन दुखिया है जग सारा।
साकेत सुमन चतुर्वेदी ने कहा-
ये समय अनुकूल अपना, रूप नव धरती रहेगी।
मुक्त अविरल ये हमारी लेखनी चलती रहेगी।
दिनेश गुरुदेव ने अपने भाव यूँ व्यक्त किये-
किसी बड़े तूफ़ान का आग़ाज़ लगता है
साज़िश बड़ी है ऐसा अंदाज़ लगता है।
युवा कवि राहुल मिश्रा ने कहा
आपसी संवाद की शुरुआत होनी चाहिए।
मूड अच्छा हो या नहीं बात होनी चाहिए।
धर्मेंद्र सारांश ने युवा मन को उड़ान देते हुए कहा-
ऐसे उठकर अचानक नहीं जाइए।
प्रेम के तोड़ मानक नहीं जाइए।
ललितपुर से आए युवा कवि रवि कुशवाहा ने कहा-
हम लालित्य ललितपुर के
बांदा की अमर निशानी हैं,
हम छत्रसाल के गायक हैं हम सच्चे हिंदुस्तानी हैं।
जब तक जीवन इस दुनिया में तब तक हिंदुस्तान रहे।
कल्याणदास साहू पोषक ने बुन्देली रचना में कहा-
हमें गर्व है ऊ माटी पै, जिते खदानें हीरन की।
दुनियाँ भर में धाक जमी है, बुन्देली के वीरन की।
संध्या निगम ने प्रणय की अनुभूति को स्वर देते हुए कहा-
चाँद सूरज अगर छुप भी जाया करें,
आप आया करें, दिल लुभाया करें।
डॉ मुहम्मद नईम ने आज के दौर की विसंगति की बात करते हुए कहा-
जब दिलों में तल्खियाँ हों कैसे हम त्यौहार मनाएँ!
आँखों में जब बदलियाँ हों कैसे हम त्यौहार मनाएँ।
डॉ सुनीता वर्मा ने कहा-
सह्याद्रि की ऊँची चोटी पर गूँजा रण का जयगान।
जन्मा भारत की धरती पर वीरों का वह स्वाभिमान।
डॉ सुधा दीक्षित ने कहा-
पंजाब की पावन धरा, फिल्लौर नगर अनूप।
जन्मे श्रद्धाराम जी, ज्ञान ज्योति का रूप।
डॉ द्युति मालिनी ने कहा-
बदली जो उनकी आँखें इरादा बदल गया,
गुल जैसी चमचमाया, बुलबुल मसल गया।
युवा कवि गिरजाशंकर कुशवाहा कुशराज ने किसान जीवन की चर्चा करते हुए कहा-
हम हैं कलम के किसान
हमारी कलम की नोंक हल बनकर
काग़ज़ की धरती पर
बोती है शब्दों को।
बुंदेली कवि रामबिहारी सोनी तुक्कड़ ने बुंदेली लोक भाषा में अपनी बात यूँ कही-
अँसुआ धड़का रओ ढडमोला सोचत खड़ो बिचारो।
इस अवसर पर डॉ बृजलता मिश्र, सुमन मिश्रा, अशोक मिश्र, दिनेश गुरुदेव, संध्या निगम भूषण, साकेत सुमन चतुर्वेदी, निहालचन्द शिवहरे, डॉ मुहम्मद नईम, सपना बबेले, शरद मिश्र, रामबिहारी सोनी तुक्कड, धर्मेन्द्र सारांश, राहुल मिश्रा, रवि कुशवाहा, अनिल बबेले, गिरिजाशंकर कुशवाहा कुशराज, डॉ० सुनीता वर्मा, डॉ० प्रेमलता श्रीवास्तव, डॉ० सुधा दीक्षित, डॉ० द्युति मालिनी आदि ने काव्य पाठ किया।
कवि सम्मेलन का संचालन डॉ राजेश तिवारी मक्खन ने, अतिथियों का स्वागत डॉ मुहम्मद नईम ने तथा आभार डॉ सुधा दीक्षित ने व्यक्त किया । इस अवसर पर देवेश श्रीवास्तव, अशोक श्रीवास्तव, पर्वत, प्रदीप कुमार, आकाश यादव, अंकित तिवारी, रितु राजपूत, मनीष मण्डल आदि उपस्थित रहे ।




