साहित्य

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई 

प्रिया काम्बोज

दादी-नानी की जुबानी सुनी एक कहानी थी

स्वराज की खातिर अंग्रेजों से दुश्मनी उसने ठानी थी

 

गुड्डे गुडिया नहीं नन्हे हाथों ने तलवार उठाई थी

मातृभूमि की खातिर मणिकर्णिका ने हुंकार लगाई थी

 

देश हमारा राज्य हमारा क्यों बैरी बन आए हो

लौट जाओ उल्टे कदमों से क्यों मरने चले आए हो

 

रानी की देख वीरता जन जन नतमस्तक हो जाता था

शौर्य पराक्रम से अन्याय भी उसके आगे झुक जाता था

 

बुंदेले का कण-कण यही बात एक बोला था

चमक उठी थी तलवार बादल उसका गर्जा था

 

नाना की छबीली बन झांसी की रानी लक्ष्मीबाई थी

कमर पर बांध बेटे को लड़ने बन दुर्गा काली आईं थी

 

भारतभूमि की खातिर रानी जान अपनी गंवायी थी

लक्ष्मीबाई है स्वाभिमान नारी का ये बात बतलायी थी

 

इतिहास अदम्य साहस और बलिदान की गाथा जब जब कहेगा

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा

 

प्रिया काम्बोज

स्वरचित कविता

सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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