
रात की बारिश
कर गई जग की कम तपिश
चमकी जब रात बिजली,
जल उठी हृदय की तितली!
उस इंद्रधनुष को मिटा दिया
जिसका तुमने सृजन किया!
वो सावन था या प्यार तुम्हारा,
जिस बरसात भूली थी जग सारा
उस प्यार को तुमने कैसे वारा?
तन मन भीगा जिसमें हमारा।
झूले थें हम सावन के झूले,
उन सुखद पलों को तुम कैसे भूले?
जग हित में हरितिमा है छाई,
मेरे हृदय में ठंडी-मीठी तन्हाई;
कुछ भ्रांति मन में पाली थी,
मन के कोने में कुछ हरियाली थी;
तुम बिन क्या होली और दिवाली
अब कोयल की कूक भी लगती गाली;
दुख-सुख ही निशा दीवा बनी
तन्हाई की कोई दवा नहीं!
आँखें दोनों बनी हैं सरिता,
उदास हृदय की मैं कविता।
कविता ए झा
नवी मुम्बई




