
लहरों की थपकी, रेत का बसेरा,
नदी के किनारे, मन ने डाला डेरा।
कल-कल करती बहती जाती धार,
जैसे कह रही हो, जीवन का सार।
कहीं शांत गहराई, कहीं चंचल लहरें,
वक्त की धूप में, यादों के पहरे।
किनारे के पत्थर, जो सहते हर वार,
सिखाते हैं कैसे, करें मुश्किलों को पार।
झुकते हुए वृक्ष, चूमते हैं पानी,
लिखते हैं पत्तों पर अपनी कहानी।
पक्षी भी आते हैं, पंख पसार कर,
प्यास बुझाते हैं, तिनके को संवार कर।
ढलती हुई शाम, जब सिंदूरी हो जाए,
नदी की लहरों में, सूरज खो जाए।
एक सुकून सा मिलता है, एकांत की छाँव में,
जैसे सारा जग सिमट आया हो, इस शीतल पाँव में। डॉ. अनीता निधि , जमशेदपुर, झारखंड



