
पेंग बढ़ाकर नभ को छू लें,
आओ झूला झूलें।
अमराई में खेलें कूदें,
छल प्रपंच को भूलें॥
चुनिया मुनिया संग सहोदर,
स्नेह समाहित सोहे।
दृश्य सुहावन अति मनभावन,
मधुर-मधुर मन मोहे॥
इंद्रधनुष सतरंग अनोखा
नभ मंडल में छाया।
पंख पसारे मोर मगन अब,
अद्भुत नृत्य दिखाया॥
रंग बिरंगी मुकुल मंजरी,
शुचि पराग बिखराये।
मौसम ने अब ली अँगड़ाई,
मादकता मन भाये॥
धानी चूनर ओढ़े धरती,
मंद-मंद मुस्काये।
पुष्पित पादप पंखुड़ियों पर,
गुंजन गीत सुनाये॥
चंचल चातक चहक चहक कर,
मादक धुन में गाये।
विपिन वीथिका की छाया में,
तरुण तृषा मिट जाये॥
डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




