साहित्य

कब तलक ख़ुदकुशी नहीं करनी

अंजलि सिंह

अंजली’ काग़ज़ी नहीं करनी l

ऐसी भी शाइरी नहीं करनी l

 

हौसला साथ कब तलक देगा,

कब तलक ख़ुदकुशी नहीं करनी l

 

मैं किसी बात पर नहीं हूं चुप,

बस मुझे बात ही नहीं करनी l

 

आ के सूरज ये पूछ ले मुझसे,

कब तलक रोशनी नहीं करनी l

 

आप इतने उदास बैठे है,

आपसे दोस्ती नहीं करनी l

 

 

दिल के अंदर उतर गया कोई l

ज़ख़्म चुपके से भर गया कोई l

 

याद आई थी कल ग़ज़ल बन के,

डाइरी में उतर गया कोई l

 

अपनी ठंडक भरी मसीहाई,

बिन छुए दिल में भर गया कोई l

 

जिस के आने से साँस आई थी,

उस के जाने से मर गया कोई l

 

जन्नतों तक रहूँगा साथ तिरे,

कर के वा’दा मुकर गया कोई l

 

हाए पहली उड़ान से पहले,

इश्क़ के पर कतर गया कोई l

 

मुद्दतों तक जम्अ हुई थी घुटन,

इत्तीफ़ाक़न बिखर गया कोई l

 

ज़ैद के ज़ेहन में रहा मौला,

ढूँडने दर-ब-दर गया कोई l

 

 

आप हैरान थे रवानी पर l

करके आई हूं रक्स पानी पर l

 

अब वो बचपन को याद करते हैं,

वो जो इतराते थे जवानी पर l

 

कोई पकड़ा नहीं गया अब तक,

किसने खींचा था तीर रानी पर l

 

एक दूजे के हो नहीं सकते,

हाय! अफसोस इस कहानी पर l

 

धर के बैठी हूं पांव जन्नत में,

इस उदासी की मेहरबानी पर l

 

 

इक दफ़ा तुम से वही वादा करेंगे l

कुछ तुम्हारे वास्ते अच्छा करेंगे l

 

एक बिल्डिंग में रहेंगे यार दोनो,

आते जाते हम तुझे देखा करेंगे l

 

हमने देखा था तुम्हारी आंख में जो,

हाँ वही सपना कभी पूरा करेंगे l

 

दोस्त तू अच्छा बुरा सब कुछ है मेरा,

फिर बता तुझसे बिछड़कर क्या करेंगे?

 

जब तू हो जाये किसी का और मैं भी,

फिर कभी इस बात पर झगड़ा करेंगे l

 

 

मेरी आंखों में ग़ौर से देखो,

एक नाज़ुक-ख़याल रक्खा है l

 

छू के देखो ये मोम जैसा है,

आज दिल खोल-खाल रक्खा है l

 

रूह के आबले नहीं जाते,

ज़ख्म भी बा-कमाल रक्खा है l

 

 

टूटकर यूं बिखर गए है हम,

चुभ न जाए कहीं उठाने से l

 

ज़हर लगते है मशवरे सबको,

हम भी संभले है चोट खाने से l

 

 

दुश्मनी क्यूं निभा रहा है तू ?

प्यार से मात क्यूं नहीं देता ?

 

तू मिरी बात काट देता है,

तू मिरा साथ क्यूं नहीं देता ?

******

 

घर में किसने ये रोशनी की है ?

कौन है चांद के घराने से ?

 

 

किसी से अब नहीं बनती, करें क्या?

नहीं बनती, नहीं बनती, मरें क्या?

 

 

कौन कहता है चुप ही रहती है ?

आके तस्वीर की सुने कोई l

 

 

ऐसे बैठे है आस में उनकी,

जैसे दरवेश बैठ जाते है l

 

 

इश्क़ करने के बाद समझे हैं,

मौत आसान है मुहब्बत में l

 

 

कोई घर पक्का बनाकर तोड़ना l

हाय! इक रिश्ता निभाकर तोड़ना l

 

 

ये सरापा बदन उदासी का,

रोने लगता है मुस्कुराने से l

 

 

हौसला मरने का नहीं मुझमें,

एक उम्मीद हादसे की है l

 

*अंजलि सिंह, दिल्ली*

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