
दिल के अंदर उतर गया कोई
ज़ख़्म चुपके से भर गया कोई
याद आई थी कल ग़ज़ल बन के
डाइरी में उतर गया कोई
अपनी ठंडक भरी मसीहाई
बिन छुए दिल में भर गया कोई
जिस के आने से साँस आई थी
उस के जाने से मर गया कोई
जन्नतों तक रहूँगा साथ तिरे
कर के वा’दा मुकर गया कोई
हाए पहली उड़ान से पहले
इश्क़ के पर कतर गया कोई
मुद्दतों तक जम्अ हुई थी घुटन
इत्तीफ़ाक़न बिखर गया कोई
ज़ैद के ज़ेहन में रहा मौला
ढूँडने दर-ब-दर गया कोई
*अंजलि सिंह, दिल्ली*



