
एक गृहस्थी के सूने आँगन में, पग अपने रखने आओगे?
धूल भरी इस देहरी पर, उस टूटी-फूटी खटिया पर,
मेरे प्रेम -स्नेह के मेंवो का रूखे-सूखे भोग को स्वीकार कर पाओगे?
हे मुरलीधर! क्या तुम सच में मुझसे मिलने आओगे?
टूटी हुई इन उम्मीदों पर, और इन बिखरते हुए सपनों पर,
सिलन भरे माथे की इन गहरी लकीरों को,
क्या अपनी करुणा के शीतल हाथ से सहलाने आओगे?
हे कान्हा! क्या इस दासी को अपनाने आओगे?
युगों-युगों से प्यासे इस मन को, और इस अंतहीन इंतज़ार को,
अपनी एक झलक से तृप्त करने आओगे?
अब और सहा नहीं जाता यह विरह का दुस्सह दर्द,
बोलो माधव! क्या मेरी इस करुण पुकार पर,
मेरे इस दीन-हीन आँगन में उतर आओगे?
हे प्राणनाथ! इस भोग में ‘तुलसी’ का पवित्र पत्ता भी है, और उससे भी बढ़कर, मेरी भक्ति का अमृत है। इसे स्वीकार करो, मेरे प्रिय!
स्वरचित-
अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर




