साहित्य

नीरज कुमार सिंह

प्रायश्चित

दिल्ली के जंतर-मंतर की धूल में कई दिनों से एक जिद पल रही है। ‘कॉकरोच पार्टी’ के बैनर तले बैठे विद्यार्थियों की आँखों में नींद नहीं, केवल एक प्रश्न है — “हमारी तपस्या का मोल कौन चुकाएगा?” उनकी माँग न अट्टालिकाओं की है, न सत्ता के सिंहासन की। वे केवल इतना चाहते हैं कि परीक्षा के पवित्र पृष्ठों पर स्याही से पहले बिकने वाली प्रश्न-कुंजियाँ बंद हों। क्योंकि जब पेपर लीक होता है, तो केवल कागज़ नहीं फटता, किसी गरीब माँ के अरमान, किसी पिता की टूटी चप्पल और किसी बेटी की आधी रात तक जलती लालटेन का धुआँ भी बिखर जाता है।

 

उन्होंने कील ठोक दी है — अब या तो न्याय होगा, या फिर इस अन्याय के शिलालेख पर हमारा मौन दर्ज होगा। हम यूँ हार मानने वालों में से नहीं।

 

इसी भीड़ में कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जिन पर समाज अक्सर उँगली उठाता है। साथी उन्हें ‘अलग’ कहकर पुकारते हैं, पर जब नारे गूँजते हैं तो उनके स्वर सबसे बुलंद होते हैं। पीड़ा का कोई लिंग नहीं होता, और प्रतिरोध की कोई निर्धारित वेश-भूषा नहीं।

 

परंतु गोदी मीडिया की आँखों पर पट्टी बँधी है। उसे उज्ज्वल जैसे मेधावी के कुर्ते पर टँकी चमकीली कढ़ाई तो दिख जाती है, पर उसकी हथेली पर उभर आई किताबों की लकीरें नहीं दिखतीं। वह मुद्दे की जड़ में पानी देने के बजाय पत्तियों पर इत्र छिड़कता है, ताकि सड़ांध की गंध दब जाए।

 

जंतर-मंतर की इस धरती पर रोज देश का भविष्य धरने पर बैठता है। वहीं दूसरी ओर, लद्दाख की बर्फीली रगों से निकला एक स्वर — सोनम वांगचुक — पिछले अठारह दिनों से अन्न-जल त्याग कर बैठा है। चिलचिलाती धूप में उनका शरीर झुलस रहा है, पर दिल्ली की सत्ता के कानों में अब भी रुई ठुसी हुई है।

 

इसी तपती दोपहरी में धरने पर तीन छायाएँ भी बैठी हैं — राहुल, विवेक और सोनी। इस तिकड़ी को कम मत आँकिए।

 

राहुल के पिता शिक्षा-तंत्र के शिखर पर बैठे हैं। विवेक के पिता न्याय के मंदिर में न्याय की कुर्सी पर विराजते हैं। सोनी के पिता प्रशासन के उस स्तंभ को थामे हैं जिस पर व्यवस्था टिकी है।

 

विडंबना यह है कि जिनके हाथों में व्यवस्था की डोर है, उन्हीं के घरों के चिराग तले अँधेरा है। ये तीनों किताबों से उतना ही दूर हैं जितना सच सत्ता से। इनकी अयोग्यता ने इनके पिताओं को हर वर्ष नए षड्यंत्र रचने पर विवश कर दिया है।

 

समाज की नज़रों में इन तीनों के पिता ‘प्रतिष्ठित’ हैं। लोग उन्हें सलाम ठोकते हैं। पर नियति ने उनके आँगन में ऐसी संतानों को रोप दिया जिनकी छाया में केवल पश्चाताप उगता है।

 

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी तीनों पिता एक ही प्रार्थना दोहराते हैं — “काश, हमारे बच्चे भी NEET निकाल लेते।” चार वर्षों में तिजोरियों का मुँह खुलते-खुलते थक गया। हर साल प्रश्न-पत्र की चोरी का ताना-बाना बुना जाता है, पर कोई न कोई सिरा भेद खोल ही देता है, और उनके स्वप्न चौराहे पर दम तोड़ देते हैं।

 

आज विवेक, राहुल और सोनी अपने उन निर्धन मित्रों के साथ धूल में बैठे हैं जिनके पास रिश्वत देने के लिए माँ के कानों की बालियाँ तक नहीं हैं। अपराध-बोध की दीमक तीनों के मन को कुतर रही है। वे सोचते हैं — “हम तो सोने के चम्मच मुँह में लेकर पैदा हुए। पैसा फेंकेंगे, डिग्री खरीद लेंगे। पर वह लड़का क्या करे जो रात भर जागकर न्यूटन के नियम रटता है? वह लड़की क्या करे जो बस के किराए बचाकर फॉर्म भरती है?”

 

इसी अपराध-बोध ने आज उनके भीतर की नालायकी को झकझोर दिया है। उन्हें लगता है कि पेपर लीक के असली अपराधी वे स्वयं हैं। यदि वे मन लगाकर पढ़ते, तो उनके पिताओं को भ्रष्टाचार की गली में न भटकना पड़ता। तब शायद सोनम वांगचुक को भी इस तरह भूखा न बैठना पड़ता।

 

आज तीनों ने मुट्ठियाँ भींच ली हैं। घर जाकर वे अपने पिताओं के सामने सिर उठाकर कहेंगे — “पिताजी, हमारे लिए अपनी आत्मा का सौदा मत कीजिए। हमें कोई छोटी-मोटी दुकान खुलवा दीजिए। हम अपने हाथों से कमाएँगे। हर साल पेपर चोरी करवाकर आप हमारी नौकरी तो खरीद लेंगे, पर हमारी नींद नहीं खरीद पाएँगे। गरीब छात्रों की आह और सोनम वांगचुक की सूखी पसलियों का शाप लेकर हम जी नहीं पाएँगे।”

 

सत्य यही है। दोषी मात्र सरकार नहीं है, दोषी हम भी नालायक विधार्थी और हमारे माँ बाप भी हैं — हम जैसी निकम्मी संतति, और हमारे वे पिता जो पद की स्याही से अपने बच्चों का भविष्य लिखना चाहते हैं।

 

 

आज विवेक, राहुल और सोनी ने प्रण लिया है — अब वे चोरी की बैसाखी पर नहीं, अपने परिश्रम के पाँव पर चलेंगे। क्योंकि लीक हुआ पेपर डिग्री तो दिला सकता है, पर चरित्र नही नही सुधार सकती है ।

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