साहित्य

बाँस की बाँसुरी में संगीत स्वर भरता

डॉ कर्नल

प्रेम प्यार की कोई रूपरेखा नहीं होती है,

वह तो प्रायः नैसर्गिक ही हो जाता है,

कभी धरती पर इंसान से हो जाता है,

उसी इंसान का भगवान से हो जाता है।

 

जब किसी की अनुभूति स्वयं से भी

अधिक अच्छी लगे तो वो प्रेम होता है,

प्रेम भरा मन तो सभी के पास होता है

पर मनोबल कम लोगों के पास होता है।

 

भलाई- बुराई इंसान के क़र्म में होती है,

बाँस का तीर बना कोई घायल करता है,

और कोई उसी बाँस की बाँसुरी बना

करके उसमें संगीत के स्वर भरता है।

 

जब साधारण इंसान पूरे आत्मविश्वास

के साथ मंज़िल पर आगे आगे बढ़ता है,

तो वही साधारण इंसान दुनिया और

सारे समाज को आइना भी दिखाता है।

 

असम्भव एक ऐसा शब्द है जो ज़्यादातर

परियों की कहानियों में पाया जाता है,

जब तक हमें यह विश्वास नही होता है,

तब तक असम्भव सम्भव नहीं हो पाता है।

 

हम टूट कर गिरे हर पत्ते पर अफ़सोस

जताते रहेंगे तो मज़बूती नहीं दिखा सकेंगे,

कोसों की यात्रा पग निकाल कर होती है,

एक एक क़दम आगे बढ़ाने से होती है।

 

जीवन की यात्रा के लिये मन व मस्तिष्क

को पूरी मज़बूती से तैयार करना पड़ता है,

आदित्य शरीर स्वस्थ व आत्म विश्वास

हर प्रकार से दृढ़ प्रतिज्ञ रखना पड़ता है।

 

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र,

‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’

’विद्यासागर’, लखनऊ

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