
पिता परिवार के आधार, अनुशासन के प्रतीक और जीवन के मौन मार्गदर्शक होते हैं। वे अपने श्रम, त्याग और संस्कारों से संतान के भविष्य को संवारते हैं। उनका स्नेह अक्सर शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में दिखाई देता है। पिता का व्यक्तित्व हमें सत्य, साहस, सम्मान और कर्तव्य का पाठ पढ़ाता है।
*शीर्षक:- पिता : धैर्य, दायित्व और संकल्प की प्रतिमूर्ति*
मैं पिता हूँ, तो तुझे झुकने न दूँगा,
हर कठिन राह में रुकने न दूँगा।
मैं पिता हूँ, तो तुझे पढ़ाऊँगा,
ज्ञान का दीप सदा जलाऊँगा।
मैं पिता हूँ, तो संस्कार दूँगा,
सत्य का पथ सदा दिखलाऊँगा।
मैं पिता हूँ, तो हिम्मत भर दूँगा,
हर संकट में तेरा संबल बनूँगा।
मैं पिता हूँ, तो साहित्य पढ़ाऊँगा,
शब्दों का सच्चा मान बताऊँगा।
यदि तू कवि बने, संवेदना दूँगा,
यदि चिकित्सक बने, सेवा सिखाऊँगा।
यदि अभियंता बने, यह याद रहे,
देश का गौरव सबसे बड़ा रहे।
मैं दुनियादारी भी समझाऊँगा,
रिश्तों का मूल्य भी बतलाऊँगा।
हार मिले तो धैर्य सिखाऊँगा,
जीत मिले तो विनय निभाऊँगा।
आँधी आए, ढाल बन जाऊँगा,
अँधियारे में दीप जलाऊँगा।
मेरे बाद भी याद यही रखना,
चरित्र से बढ़कर धन नहीं होता।
यही मेरी सबसे बड़ी कमाई है,
संतान ही पिता की सच्ची परछाई है।
*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




