साहित्य

रात का सन्नाटा

डॉ रामशंकर चंचल 

रात का सन्नाटा पसरा

मैं सदा की तरह

जब से होश संभला

जाग रहा हूं

पहले तुम मेरे पास

साथ गहरी नींद में

सोती थीं, पर सुकून था

कोई है अकेला नहीं हूं

अब जब तुम अकेला

कर चली गई

छोड़ ईश्वर के पास

तब जीना तो है

क्यों कि मर नहीं सकते

कभी फंखे की आवाज में

साथ हलचल महसूस कर लेता

कभी बरसती बूंदों की

टॉप में सुकून पा लेता

तो कभी रजाइयों की

गर्माहट में तुम्हारा अहसास

क्या कर सकता

कोई चारा नहीं

जीना है तो यह सब तो

अहसास जरूरी है

अब सवाल यह कि

जीना क्यों

यही तो नहीं जान पाया कि

जीना क्यों

बस इतना जानता हूं

मरना कायरता होगी

कमजोरी होगी

क्या कहेगे लोग

ऐसी सैकड़ों बातें है

जो मरने नहीं देती

और जीते जी

रोज मारती हुई

जिंदगी धकेल देती

क्या यही जीवन है

यदि यही जीवन है तो

यह कोई जीवन नहीं हुआ

कुछ तो करें और यही सोच

लिखने बैठ गया

सदा की तरफ

अपनी हर पीड़ा को व्यक्त करते

ताकि लिख राहत पाऊं

ताकि सुबह फिर ताज़गी का

अहसास करें

किरदार निभा सके

ईमानदारी से

सोच रहा हूं

व्यर्थ समय खराब कर रहा

कौन पड़ेगा

और पड़ भी लिया तो क्या होगा

होना तो वहीं है

जो राम रची रखा

और सोचते हुए

रात निकल गई

सुबह के पांच बज गए

कुछ नींद सी आ रही

क्यों कि दिमाग सोचते हुए

थक गया बहुत

और सो जाता हूं

आंखें बंद कर

नींद के इंतजार में

पता नहीं कब आई

कितनी आई

राम जाने साहब

सारी जिंदगी राम जाने के

सहारे गुजार दी तो

अब क्या सोचना

वो जाने

उसका दिया जीवन

मैं क्यों परेशान रहूं

सो जाता हूं

कल फिर

इसी तरह दिन

माह,साल और जिंदगी

चल रही हैं

राम जाने

कब तक,,,

 

 

डॉ रामशंकर चंचल

झाबुआ मध्य प्रदेश

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