
कभी शायरी लिखूँ जो काग़ज़ पर,
शब्दों में मेरे अश्क देखते रहना।
स्याही समझकर मत पढ़ना तुम,
हर अक्षर में मेरा दर्द देखते रहना॥
हर पंक्ति किसी टूटी आस की दास्ताँ कहेगी,
हर उपमा मौन पीड़ा की जुबाँ बनेगी।
हँसी दिखाई दे यदि मेरी रचना के चेहरे पर,
उसके पीछे सिसकती हुई रूह देखते रहना॥
मेरे शब्दों में केवल अलंकार नहीं मिलेंगे,
कुछ अधूरे सपनों के संसार मिलेंगे।
जो घाव समय भी भर न सका अब तक,
उनका हर निशान बार-बार देखते रहना॥
कविता कभी यूँ ही जन्म नहीं लेती, दोस्तों,
पहले हृदय टूटता है, फिर कलम चलती है।
जो पीड़ा शब्द बनकर अमर हो जाती है,
वही साहित्य की सच्ची सरिता बहती है॥
यदि कभी मेरी रचना तुम्हें रुला जाए,
समझना कोई दर्द फिर मुस्कुराया है।
मैंने आँसू नहीं, जीवन लिख दिया है इसमें,
हर शब्द में मेरा अस्तित्व देखते रहना॥
*स्वरचित मौलिक*
*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*




