
पहले जैसी फिर आओ न रिमझिम-रिमझिम धार करो।
मन की बगिया पुलकित हो आलिंगन एकबार करो।
हे! बरखा तुमने मुझमे मधुरिम जीवन राग भरा,
मन महुआ ने हार पहन जल दर्पण में शृंगार किया.
घनघ-घनन आवाज से फिर मन वीणा के सुस्मित तार करो।
मन की बगिया पुलकित हो आलिंगन एकबार करो।
तेरे अविरल रस वर्षा में, भौंर कण्ठ गुंजित होता,
अधर पुष्प पर तब कोई गीत मधुर सुष्मित होता।
तुम निज वाणी कण्ठ मना से, हृदय खोल कर प्यार करो।
मन की बगिया पुलकित हो आलिंगन एकबार करो.
तेरे निश्छल आलिंगन में हम भींग-भींग गाते थे,
संचालन तुम करती मन ताल तलैया भर जाते थे।
उसी स्नेहमयि आलिंगन से तृषित सा मन सुखधार करो।
मन की बगिया पुलकित हो आलिंगन एकबार करो।
कभी हवा के झोके से तुम बढ आयी ओसारे में,
चंचल पाँव की धनक तुम्हारी
दस्तक दे मन द्वारे पे,
पुलक उठी थी सर से पांँव तक फिर वैसा एकबार करो।
मन की बगिया पुलकित हो आलिंगन एकबार करो।
तुमने मन सरवर पर आकर जलज कमल विस्तार किया,
तेरे निर्मल हास-विन्दु ने, मुझको मधुरस पान दिया.
अमिय वर्षिणी मेघमाल तुम,मुझमें आ शृंगार भरो।
मन की बगिया पुलकित हो आलिंगन एकबार करो।
संगीता शिवपुरी
सादर समीक्षार्थ🙏🏽🙏🏽




