साहित्य

बरसा

डॉ गीता पांडेय

गगन

बादल छाए

चंचल चपला चमकी

झमझम बरसा

पानी।

 

उमस

जब बढ़ती

बरसा की बूँदें

शीतल मन

करती।

 

बरसा

लगे सुखद

धरती गिरती बूंँद

शीतल होता

मन।

 

बरसा

जब होती

कृषक प्रमुदित हो

करते अपनी

खेती।

 

रिमझिम

बरसा पानी

बच्चे करते मनमानी

भीग कर

आते।

 

प्रकृति

करे मनुहार

मिलन उसका बरसा

से जब

होता।

 

बरसा

ऋतु आई

नदिया सब उफनाई

लहरें गाती

संगीत।

 

दादुर

चहुँ दिशि

टर्र-टर्र बोलते हैं

जब होती

बरसा।

 

बादल

काले छाते

नभ में जब

मूसलाधार होती

बरसा।

 

धरती

हरी-भरी होकर

अनुपम लगती है

होती जब

बरसा।

 

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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