साहित्य

दीपक और सवेरा

डॉ उषा अग्रवाल

दीपक बोला रात घनेरी, रोशन करूँ जहान।

तिमिर हटाया हरदम मैने, तब तो बना महान।।

 

सवेरा हॅंसता हुआ बोला, में रोशन करूँ विहान

मेरे आते ही जग में होता, गीता रामायण गान।।

 

दीपक बोला मैने तो राह दिखाई रात।

थके हुए पथिक का बनता में मेहमान।।

 

सत्य सवेरा बोला भाई तू करता बहुत तपस्या।

तेरे कारण ही में हूँ तू तो देता सबको दान।।

 

जीवन में दीपक बन जलना, करना उजाला भोर।

शोभित रहते कर्म यहाँ जब, मिलता है सम्मान।।

 

दीपक और सवेरा करते जग उपकार।

एक जगाता आशाओं को एक दिया वितान।।

 

 

जब तक रात घनेरी रहती, दीपक करे प्रकाश।

उषा की स्वर्णिम किरणों से, नव जागृत पहचान।।

 

स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

छतरपुर मध्यप्रदेश

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