
कलम विवश है सच लिखने को,कैसा हुआ समाज।
हृदय-भाव जो कल पावन थें,नहीं मिले क्यों आज।।
हिंसा-गाथा चहुँदिसि अब है, नहीं कहीं है प्रीत।
प्रीत जुड़ी जो मात्र द्रव्य से,यही लिया उर-जीत।।
भाई-भाई नहीं रहे अब,कहाँ अधम में लाज।
हृदय-भाव जो कल पावन थें,नहीं मिले क्यों आज।।
कल तक जो था जीवनसाथी,नहीं रहा पहचान।
हृदय-गीत अब नहीं कहीं है,स्पंदन से अंजान।।
लक्ष्य सधा है हर रिश्ते में, स्वार्थ प्रमुख निज काज।
हृदय-भाव जो कल पावन थें,नहीं मिले क्यों आज।।
पुत्री माँ की काल बनी है,पुत्र बना शैतान।
हठ पूरी जो नहीं करे तो,देनी होगी जान।।
ईश्वर तेरा मात्र सहारा,झंकृत हो उर साज।
हृदय-भाव जो कल पावन थें,नहीं मिले क्यों आज।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी



