साहित्य

घनघोर घटायें

डाॅ. सरला सिंह

गरजें नभ में घनघोर घटायें

रात अँधेरी दिन में है छायी।

 

घनन घनन मेघा यह गरजे है

चमके संग संग ये बीजुरिया।

काँपे मनवा है सुमिरन करता

कान्हा कान्हा ही ये रटे हिया।

गली गली है नदिया सी बहती

कैसी देखो है ऋतु ये आयी।

 

लहर लहर लहरायें हैं नदियाँ

कहीं तोड़के तटबँध वे हरसें।

काले कजरारे मतवारे यह

झमझम करते देखो ये बरसें।

उमड़-घुमड़ कर बादल हैं छाये।

धरती ने है नवजीवन पायी।

 

हैं खेत बाग वन मुदित हुए सब

नव जीवन सा सबने है पाया।

अमृत-सा नीर बरसे बादल से

सबके हित है नवजीवन लाया।

गरजें नभ में घनघोर घटायें

रात अँधेरी दिन में है छायी।

 

 

डाॅ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’

दिल्ली

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