साहित्य

गुरुवर मेरे सर्वस्व

सरोज शर्मा

आप गुरुवर ही नहीं , सर्वस्व ही मेरे आप  हैं,

मन ज्ञान लौ भर कर मेरे , हरते सभी संताप हैं ।

 

मैं भटकता मूर्ख अज्ञानी ,जगत में दर-बदर,

कर दिया देदीप्य मन, ज्ञान का आलोक भर ।

 

राह थी  दिखती नहीं ,अंधकार था अज्ञान का ,

पथ प्रदर्शित कर दिया देकर उजाला ज्ञान का ।

 

तार्किक क्षमता भरी,गुन,नीति,मन संस्कार भी,

जीत लूं हर कर्म को मद,दर्प ,दुख अहंकार भी ।

 

कब,कहाँ, क्यों और कैसे ,क्या करूं सिखला दिया,

मान,ध्यान,सम्मान,जप,तप मार्ग सब दिखला दिया।

 

मीठी वाणी,सही निर्णय,कार्य समय से कैसे करूं,

संकट घड़ी,जीत-हार में,मन सुदृढकर धीरज धरुँ ।

 

विद्वान ,राजा,मूर्ख,कृपण,अहंकारी को कैसे हरुँ, .

हर पराजय से निकल,कैसे विजय को वरण करूं ।

 

रखना कृपा,सर हाथ मेरे, मैं तो चरण रज ,धूल हूं, ‘

घट रूप देकर गढ़ दिया अस्तित्व ,जग अनुकूल हूँ ।

 

सरोज शर्मा

दिल्ली

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