
आप गुरुवर ही नहीं , सर्वस्व ही मेरे आप हैं,
मन ज्ञान लौ भर कर मेरे , हरते सभी संताप हैं ।
मैं भटकता मूर्ख अज्ञानी ,जगत में दर-बदर,
कर दिया देदीप्य मन, ज्ञान का आलोक भर ।
राह थी दिखती नहीं ,अंधकार था अज्ञान का ,
पथ प्रदर्शित कर दिया देकर उजाला ज्ञान का ।
तार्किक क्षमता भरी,गुन,नीति,मन संस्कार भी,
जीत लूं हर कर्म को मद,दर्प ,दुख अहंकार भी ।
कब,कहाँ, क्यों और कैसे ,क्या करूं सिखला दिया,
मान,ध्यान,सम्मान,जप,तप मार्ग सब दिखला दिया।
मीठी वाणी,सही निर्णय,कार्य समय से कैसे करूं,
संकट घड़ी,जीत-हार में,मन सुदृढकर धीरज धरुँ ।
विद्वान ,राजा,मूर्ख,कृपण,अहंकारी को कैसे हरुँ, .
हर पराजय से निकल,कैसे विजय को वरण करूं ।
रखना कृपा,सर हाथ मेरे, मैं तो चरण रज ,धूल हूं, ‘
घट रूप देकर गढ़ दिया अस्तित्व ,जग अनुकूल हूँ ।
सरोज शर्मा
दिल्ली




