साहित्य

हिंदी साहित्य का इतिहास

आदरणीया श्री ठाकुर

वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी, प्रयागराज (उ.प्र.) के तत्वावधान में 18 जुलाई 2026, शनिवार को सायं 08:15 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक 18वीं राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी का सफलतापूर्वक आयोजन सम्पन्न हुआ। इस संगोष्ठी का विषय “हिंदी साहित्य का इतिहास (द्विवेदी युग के कवि)” रहा। प्रदत्त विषय पर विद्वान वक्ताओं ने विस्तृत एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किए तथा उपस्थित सभी सुधी साहित्य मनीषियों ने भी अपने विचार साझा किए। इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से साहित्यप्रेमियों, शोधार्थियों एवं विद्वानों की गरिमामयी सहभागिता रही।

 

संस्था के संस्थापक एवं अध्यक्ष डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ के निर्देशन में संगोष्ठी का कुशल संचालन आदरणीया श्री ठाकुर (देवघर, झारखंड) द्वारा किया गया।

 

सर्वप्रथम संस्था की संरक्षिका आदरणीया विनीता निर्झर द्वारा अपने सुमधुर स्वर में सरस्वती वंदना की भावपूर्ण प्रस्तुति दी गई, जिससे कार्यक्रम का शुभारंभ अत्यंत गरिमामय तथा भक्तिमय वातावरण में हुआ।

 

तत्पश्चात हरीश कुमार सिंह भदौरिया ने स्वागत उद्बोधन के माध्यम से सभी अतिथियों, वक्ताओं, श्रोताओं तथा मंच के संचालक मंडल का हार्दिक स्वागत व अभिनंदन किया।

 

इसके उपरांत संचालिका आदरणीया श्री ठाकुर (देवघर, झारखंड) ने प्रथम वक्ता के रूप में आदरणीया सुनीता आनंद मिश्रा को आमंत्रित किया। उन्होंने द्विवेदी युग के प्रमुख कवियों, उनकी साहित्यिक विशेषताओं, भाषा-शैली तथा हिंदी साहित्य में उनके अमूल्य योगदान पर अत्यंत विस्तृत, प्रभावशाली एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सहित इस युग के अन्य रचनाकारों के कृतित्व पर प्रकाश डाला। आदरणीय सुनीता आनंद मिश्रा ने बताया कि द्विवेदी जी ने तत्कालीन साहित्य में खड़ी बोली का प्रादुर्भाव किया।

 

इसके पश्चात द्वितीय वक्ता आदरणीया डॉ. संगीता ने अपने ओजस्वी वक्तव्य में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रसिद्ध पंक्तियों का उद्धरण देते हुए द्विवेदी युग के प्रमुख रचनाकारों एवं उनकी साहित्यिक उपलब्धियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने अवगत कराया क्यों इस युग का नाम द्विवेदी युग पड़ा। किस प्रकार द्विवेदी जी ने साहित्य में ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली को महत्त्व दिया तथा सभी को खड़ी बोली में लिखने के लिए प्रेरित किया। डॉ संगीता ने बताया कि द्विवेदी जी ने सरल, सहज और परिष्कृत शैली में लिखने पर जोर दिया।

 

संगोष्ठी के समीक्षक आदरणीय डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ ने अपने समीक्षात्मक सम्बोधन में द्विवेदी युग की साहित्यिक चेतना, राष्ट्रीय भावना एवं रचनाधर्मिता का अत्यंत सुंदर विश्लेषण प्रस्तुत किया। आपने बताया आचार्य द्विवेदी ने लगभग 18 वर्षों तक सरस्वती पत्रिका का संपादन किया। सरस्वती उस काल-खंड की एकमात्र राष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका थी जिसका उद्देश्य हिंदी भाषा में खड़ी बोली की स्थापना करना था। इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने भाषा को परिष्कृत व परिमार्जित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी समीक्षात्मक दृष्टि ने पूरे विषय का प्रभावी एवं संतुलित मूल्यांकन किया, जिसे सभी प्रतिभागियों ने अत्यंत सराहना किया।

 

इस संगोष्ठी में डॉ कुमकुम शुक्ला, डॉ पंकजवासिनी, आ. नीरू जैन, आ. शशि गुप्ता, आ. छाया शाह सख्य, आ. कशिश कुमारी, आ. संजय गुप्ता, डॉ आराधना उपाध्याय इत्यादि दर्शक दीर्घा में उपस्थित रहे। दर्शकों में से आ. नीरू जैन, आ. शशि गुप्ता, आ. छाया शाह सख्य, आ. कशिश कुमारी, आ. संजय गुप्ता ने भी अपने विचार प्रकट किए। विशेष उल्लेखनीय है कि कशिश कुमारी, जो वर्तमान में कक्षा 11वीं की छात्रा हैं, साहित्य के प्रति गहरी रुचि रखती हैं। इतनी कम आयु में उनकी साहित्यिक प्रतिभा, अभिव्यक्ति एवं आत्मविश्वास सराहनीय है।

 

इसके उपरांत व्यवस्थापक आदरणीय दुर्गादत्त मिश्र ‘बाबा’ ने संगोष्ठी में उपस्थित सभी वक्ताओं, अतिथियों, श्रोताओं एवं साहित्यप्रेमियों के प्रति हार्दिक आभार प्रकट किया। उन्होंने कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु संस्था के संस्थापक एवं अध्यक्ष डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ सहित सभी वक्ताओं, संचालिका तथा आयोजन समिति के समस्त सदस्यों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

 

अंत में संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ ने संचालिका आदरणीया श्री ठाकुर के कुशल और सारगर्भित संचालन की प्रशंसा की तथा कार्यक्रम की औपचारिक समापन की घोषणा किया। इस प्रकार “हिंदी साहित्य का इतिहास – द्विवेदी युग के कवि” विषयक 18वीं राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी अत्यंत गरिमापूर्ण एवं सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। संगोष्ठी ने हिंदी साहित्य के इतिहास, विशेषकर द्विवेदी युग के रचनाकारों को समझने की दिशा में एक सार्थक एवं ज्ञानवर्धक अवसर प्रदान किया। उपस्थित सभी साहित्यप्रेमियों ने आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए संस्था के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

 

*डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’*

संस्थापक व अध्यक्ष वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी, प्रयागराज (उ0 प्र0)

संपादक । समीक्षक । स्तंभकार । छंद विशेषज्ञ । निबंधकार।

 

समाचार संकलन एवं प्रस्तुति :

*आदरणीया श्री ठाकुर*

देवघर, झारखंड

कवयित्री | मंच संचालिका | साहित्यकार | शिक्षाविद्

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