
जब कर्म ही कालिख से सने हों,
तो माला के दाने भी,
व्यर्थ की गड़गड़ाहट मात्र हैं।
हृदय के एकांत में,
जब भीतर का सूर्य ही ढल चुका हो,तब
हाथों में लिपटी वो माला,क्या किसी अंधकार को मिटा पाएगी?
स्वयं से झूठ बोलने का,
एक अनुष्ठान भर है यह,
कि पवित्र धागे,
अपवित्र स्मृतियों को बाँध लेंगे।
पर सच तो यह है:ईश्वर वहां नहीं है,जहाँ माला है।
ईश्वर वहां है,जहाँ कर्म का दर्पण,
बिना किसी धूल के,
स्वयं को पहचान ले।
जब अंतर्मन ही आहत हो,
तो काष्ठ के मनकों में,
कौन सी प्रार्थना सोई है?
माला तब भी मौन थी,
और अब भी मौन है।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।



