कहते है सब लोग
हो कहाँ प्रभु वर,
दिखते नहीं हो
छिप कर रहते हो, कहाँ।
देखी आकृति वृक्ष,तने पर
हो तुम, ऊकेरी भी तुमने,
भरा हजारों प्रकार का रंग हरा
मिला पीला-भूरा-लाल।
सजा दिये फिर डाल पर
ऊँची-नीची शाखा बनाकर,
किसी के पत्ते बड़े और खुर्दरें
किसी के छोटे और कोमल।
पुष्प बनाये अनगिनत प्रकार
लाल-नीले-पीले-भूरे-बैंगनी- काले,
मोह लिया सबका मन
सुन्दर सुगंध-सुगंधित डाल के।
वो देखो गिलहरी जा रही
ची-ची करती आवाज,
दूसरी जा रही मुँह में लिये छोटी डंडी
किसने सिखाया उसे घर बनाना।
निकाल पाती मुँह से एक शब्द माँ
वो गाय जिसे हम गौ माता
बुलाते,
रखती वो हम हमारे बच्चों का ध्यान,
अपना अमृत सहर्ष प्रदान करती।
वो नभ नीला-नीला
दिखाता कितने ही रंग,
धरा को दिया मातृत्व का वरदान
सब जीवों का वो प्रेम से उदर पूर्ति करती।
दे दी शक्ति पंख-पंख में
देखो वो उड़ रहा गगन में,
एक प्यारा न्यारा संसार
बनाते जो घोंसले न्यारे- बेशुमार।
ना जाने कैसे
प्रभु तुम दिखते हो मुझे,
वृक्ष की हर शाखा में तुम
डाल-डाल पत्ते-पत्ते पर तुम हो।
बह रही सुन्दर धीमी-धीमी
मस्त-मस्त पवन में तुम हो,
दे जाती जीवन जग के हर प्राणी को
तुम नहीं प्रभु,फिर कौन है….
तुम नहीं प्रभु तो वो कौन है………….
स्वरचित काव्य
डॉ. प्रभा जैन “श्री ”
देहरादून




