
सीना चीर धरा का मेहनत से सोना उगता।
बंजर भू पर बहार लाअन्नदाता या कर्जदाता।।
सुबह सबेरे मेहनत कर खुशियाँ जीवन लाता।
धूप शीत बर्षा को सहकर फसल नई उगाता।।
उसके खून पसीने से अन्न भंडार है आता।
अन्नदाता का जीवन कर्ज में ही बीत जाता।।
बीज खाद पानी के लिए ऋण वह जब लेता।
मानसून धोखा देता फसल खराब कर देता।।
बाजार मंडी में जब कीमत है गिर जाती।
मेहनत की कमाई उसकी फीकी पड़ जाती।।
पेट सभी का भरता जीवन सबको देता।
अन्नदाता जो कहलाता कर्जदाता बन खेता।।
सदियों से वह लाचार खड़ा शोषण झेलता।
कर्ज मुसीबत सूखा पड़ता बाढ़ झेल न रोता।।
मिट्टी की खुशबू ले खेत देखकर मुस्काता।
नई उम्मीदों के संग बीज बोया फसल उगाता।।
किसान सदैव खुशहाल देश खुशहाल रहेगा।
अन्नदाता का गौरव बढ़ता कर्जदाता न रहेगा।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




