ये पेट की भूख कभी खत्म न होगी,
जिंदगी इसके सहारे ही काटते हैं लोग।
रोटी की खुशबू में बसते हैं सपने,
आँसू भी पी जाते हैं हँसते हुए लोग।
कोई महलों में थाली सजाता,
कोई सूखी रोटी को तरसता रोज।
किस्मत की चौखट पर बैठा इंसान,
मांग रहा बस दो वक्त का भोज।
माँ अपने हिस्से की रोटी छोड़कर
बच्चों की मुस्कानों में जी जाती है।
बाप पसीने को मोती बनाकर,
हर शाम उम्मीदों की लौ जलाता है।
भूख न जाति देखती, न धर्म पहचानती,
बस खाली पेट का दर्द सुनाती है।
जिस दिन कोई भूखा न सोए इस धरती पर
,वही सच्ची इंसानियत कहलाती है।
आओ ऐसा संसार सजाएँ मिलकर,
जहाँ हर आँगन में खुशहाली होगी।
जब हर चेहरे पर रोटी संग मुस्कान खिलेगी,
तभी सच में जीवन की दिवाली होगी।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




