
किसी नगर में एक ब्राह्मण परिवार रहता था उस ब्राह्मण परिवार में माता-पिता के अतिरिक्त चार पुत्र थे।
आपस में उन सभी भाइयों की बहुत अच्छी तरह निभती थी। घर परिवार से बहुत ही ज्यादा निर्धन थे,उन लोगों ने गरीबी को अपने बहुत ही नजदीकी से देखा था और प्रतिदिन उसी गरीबी को लेकर धिक्कारते रहते थे।
“घास पर सोना, जंगल में रहकर बसर करना, कांटों से भरा जीवन व्यतीत करना ठीक है, लेकिन पड़ोसी के बीच में गरीबों का जीवन व्यतीत करना और उनके सामने हाथ फैलाना बिल्कुल भी ठीक नहीं है।”
मन ही मन बुदबुदाता है कि जिस मनुष्य के पास धन नहीं होता, बहुत दिल का साफ होने पर भी उसे कोई समझ नहीं पता है और ना कोई उससे संतुष्ट होता है।
परिवार के अच्छे लोग भी उसका साथ छोड़ देते हैं वह गुमान होते हुए भी उसके गुना को कोई पहचानता नहीं है, उसके गुण भी लोगों को शोभा नहीं देते हैं। यहां तक की वक्त पड़ने पर पुत्र भी साथ छोड़ देता है विपत्तियों का पहाड़ टूटने लगता है,
ऐसा भी देखा गया है की उच्च कल में पैदा होने वाले पुरुष या स्त्री भी ऐसा ही बताओ करते हुए देखे गए हैं और करते भी हैं। यही नहीं धन वैभव के अभाव में मित्रता को छोड़ देता है उसका त्याग कर देता है। यह सभी बातें आपस में एक दूसरे से मन को हल्का करने के लिए वह चारों ब्राह्मणों ने विचार-विमर्श किया कि(-सभी ब्राह्मणों ने )आपस में बात करके धन कमाने के उद्देश्य से दूसरे शहर को जाने का निर्णय और दूसरे शहर में जाकर प्रस्थान करने का एक सुविचार भी किया।
“चिंता में व्याकुल चित्त मनुष्य को सत्य छोड़ने, घर परिवार तथा बंधु बांधव छोड़ने को भी मजबूर कर देता है इसी का नाम गरीबी और असहाय होता है।”
दूसरे शहर जाते हुए एक अघोरी बाबा से भेंट हो जाती है उन्होंने चारों ब्राह्मणों से कारण पूछते हुए अपने मठ में आने का निवेदन किया और उन्हें समझाया। ब्राह्मण ने बात करने के दौरान कहा मुझे धन चाहिए न की मृत्यु चाहिए क्योंकि मैं बहुत परेशान हो गया हूं ,लेकिन मैं साहसी हूं कुछ भी करने को तैयार हूं जहां भी धन होगा प्राप्त करूंगा ,कृपया आप उपाय बताने का कष्ट करें।
योगी बाबा ने मार्गदर्शन के अनुसार बताया–तुम सब हिमालय पर्वत की दिव्या ऊंचाई में जाओ दिशा के चारों तरफ दीपक हाथ में लेते जाओ, जिस स्थान पर जो दीपक अनायास ही गिर जाए उसी स्थान पर धन की प्राप्ति होगी।
एक ब्राह्मण पहाड़ के मार्ग पर ही चढ़ा की ऊंचाई आते ही दीपक गिर गया उसने वहां खुदाई की तो तांबा प्राप्त हुआ उसने कहा तांबा से गरीबी दूर नहीं होगी उसे वहीं पर छोड़ दिया।
दूसरा ब्राह्मण कुछ आगे बढ़ा वहां पर उसका दीपक गिर गया उसने भी खुदाई करी तो उसे वहां पर चांदी मिली सभी ने कहा चलो चांदी भर लो इससे गरीबी तो दूर हो जाएगी और जिसने गड्ढा खोदा वह लेकर के चला गया किंतु मन में लालच बढ़ती ही गई इसके बाद तो सोना ही मिलेगा यह मन में विश्वास था ऐसा ही हुआ।
तीसरे ब्राह्मण का दीपक जब गिरा तो उसमें खुदाई की तो सोना ही प्राप्त हुआ लालच हर पल बढ़ता ही गया मन ही मन सोचा सोना से अच्छा तो माणिक प्राप्त होती?तो अच्छा होता इसके बाद फिर
वह ऊंचाइयों पर पहुंचा और चौथा दीपक गिरा तो तो उसे खुदाई में मानिक प्राप्त हुआ सभी के मन में लालच भरा हुआ था कि मानिक से गरीबी दूर हो सकती है यह सत्य है, तांबा सोना चांदी से नहीं?
जैसे ही माणिक्य खुदाई में प्राप्त कर ब्राह्मण आगे को बढ़ता है वहां धूप और ऊंचाइयों के कारण प्यास लगने लगी थोड़ी दूर पर उसे एक व्यक्ति खून से लथपथ दिखा –उसमें से एक ब्राह्मण ने पास जाकर पूछा -“यह खून क्यों बह रहा है, और यह चक्र तुम्हारे सिर के ऊपर क्यों चक्कर काट रहा है।”
उसने बताया –जो भी धन प्राप्ति के लिए यहां आता है तो दोबारा वह वापस नहीं जा पता है इतना कहते ही उसे ब्राह्मण के सिर के ऊपर भी चक्र चक्कर लगाने लगा और वह वहां से वापस नहीं लौट सका।
इसलिए मनुष्य को किसी के कहने मात्र से कभी भी लालच में आकर के कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए लालच का परिणाम हमेशा ही बुरा होता है जैसे इन चारों ब्राह्मणों का हुआ।कहा गया है की “लालच बुरी बलाय” होती है
कवयित्री/ लेखिका/ साहित्यकार/शिक्षिका ;अन्नपूर्णा मालवीया )(सुभाषिनी )
संस्कृत (प्रवक्ता )
प्रयागराज उत्तर प्रदेश।
नोट:- यह कहानी मौलिक एवं अप्रकाशित है
दिनांक:-25/06/2026




