
श्रमिक तुम कितने महान हो ,
जन जन का तुम अरमान हो ,
जो भी करते उपेक्षा तुम्हारी ,
उर से तुम उनके सम्मान हो ।
बेशक हो तुम तो एक मजदूर ,
किंतु नहीं किसी से मजबूर ,
जन जन मन तेरा होता वास ,
हो न पाते किसी से दूर नहीं ।
सच तुम्हीं विश्वकर्मा के रूप ,
धूप से देते तुम छाया अनूप ,
सुनते सबके तुम ताने बाने ,
सपने सजाते उसीके हो चुप ।
जन जन के सहते प्रताड़ना ,
फिर भी सीखा मन मारना ,
फिर भी श्रम करते निरंतर ,
नहीं सीखा तुमने है हारना ।
लिए तुम भी ईश्वर का रूप ,
ईश्वर का ही ईश वर है तू ,
तुमसे कौन काम है वंचित ,
धड़ बचाने को देता घर है तू ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।



