साहित्य

माह आषाढ़ की रौनक

डॉक्टर शशिकला

आषाढ़ आया झमाझम वर्षा लाया, जगत हरसाया ।

सृष्टि ने तपन से पीछा छुड़ाया, वर्षा ने जल -अमृत बूंद -बूंद बरसाया।

धरती ने हरियाला सुंदर रूप दिखाया।

तरु पल्लव -पुष्पों ने ,धरती को खूब सजाया।

काले बादल उमड़- घुमड़ के बरसे, नदी झरनों में पानी बहाया।

खेतों में फसले मुस्काई, किसान हरसाया ।

वन ,उपवन को ,आषाढ़ की वर्षा ने महाकाया।

कोयल ने कुहू -कुहू ,पपिहा ने पीहू- पीहू गीत सुनाया ।

चहके सारे पक्षी ,मोर ने सुंदर नृत्य दिखाया।

जनजीवन में ,आषाढ़ ने आशादीप जलाया ।

आषाढ़ में देवता और प्रभु विष्णु ने, चार माह शयन-सोने का मन है बनाया ।

शुभ कार्य शादी ,मुंडन, गृह प्रवेश पर बंधन है लगाया ।

मानव ने भी चौमासे में ,भागवत कथा -व्रत -पूजन -ध्यान में मन लगाया।

देवशयन ग्यारस को ,सनातनियों ने धर्म निभाया ।

आषाढ़ पूर्णिमा -गुरु पूर्णिमा को गुरु पूजा कर शीश नवाया ।

गुरु सेवा -सम्मान कर ,शिष्यों ने आशीष पाया ।

शिव भक्तों ने शिवलिंग पर, जलाभिषेक कर पुण्य पाया।

कावडि़यों ने कावड़ पदयात्रा करके प्रभु शिव को खूब मनाया ।

आसमान में चमकी बिजली ,आषाढ़ ने जग को चमकाया।

शीतल सुंदर पवन बहे, जीव जंतुओं ने सुख पाया ।

भर गए पोखर -ताल -तलैया ,बच्चों ने कागज की नांव को तैराया ।

सजनी ने संदेश भेजकर ,साजन को परदेस से बुलाया ।

आषाढ़ आया, झमाझम वर्षा लाया, जगत हरसाया ।

रचयिता

डॉक्टर शशिकला अवस्थी इंदौर मध्य प्रदेश

रचना स्वरचित और मौलिक है।

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