साहित्य

ग़ज़ल

अमर सिंह

करने लगा है क्या-क्या अब काम ये ज़माना।

सुनते हैं राम जी का खाली हुआ ख़ज़ाना।।

 

ईमान की परीक्षा होती है हर जगह पर,

आसाँ नहीं है चलकर सत्मार्ग को निभाना।

 

समझेंगे मोल क्या वे भक्तों के आँसुओं का,

मुश्किल पड़ेगा उनको श्री राम को भुलाना।

 

जिस थाल में सजे थे श्रद्धा भरे निवाले,

सोचा न था पड़ेगा ये दर्द भी उठाना।

 

मंदिर हो या कि मस्जिद गुरुद्वार हो शिवाला,

इनमें ज़रूरी सबसे विश्वास को बचाना।

 

उपदेश देना पर को आसान सबसे ज्यादा,

आसाँ नहीं है बिल्कुल खुद से नज़र मिलना।

 

लोभों की आग ने अब रिश्ते सभी जलाए,

अच्छा न माना जाता विश्वास टूट जाना।

 

पेटी में दान की था पैसा ग़रीब का भी,

अखरा है उनका पैसा किसी काम में न आना।

 

करता ‘अमर’ ये विनती दरबार ए राम जी से,

सेवा बने इबादत, न लोभ का ठिकाना।

 

अमर सिंह राय

नौगाँव, मध्य प्रदेश

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