
प्रथम फुहारों ने सूखे कण-कण में नव प्राण जगाया,
मंद समीर ने वर्षा-राग का मधुर निमंत्रण गाया,
प्रकृति ने मुस्काकर जीवन का अभिनव पर्व मनाया।
खेतों की हर मेड़ आज आशा का दीप जलाती है,
किसान की श्रम-सिक्त हथेली स्वर्णिम कल का गीत सुनाती है।
बीज मौन तपस्वी बनकर अमृत-बूंदों का वरण करें,
धरती मां के पावन आंचल में हरित स्वप्न फिर साकार करें।
दादुर की गूंज पपीहे की तान वन-उपवन हर्षाते हैं,
मोर-पंख नभ के रंग समेटे नर्तन कर इठलाते हैं।
धान की कोमल बालियां मंद पवन में जब झूम उठें,
मानो लक्ष्मी स्वयं कृषक के आंगन पग धरने को उठें।
इंद्रधनुष का दिव्य मुकुट जब अंबर के मस्तक सजता है,
निर्झर का निर्मल कलकल-गान मन का संताप हरता है।
वर्षा केवल जलधारा नहीं ईश्वर का मंगल आशीष है,
इसके स्पर्श से धरा का प्रत्येक कण नवजीवन का साक्षी है।
हे मेघ! यूं ही करुणा बरसा श्रम का मान अमर हो जाए,
हर किसान के अधरों पर फिर संतोष का सुमन खिल जाए।
अन्नमय हो प्रत्येक घर कोई भूखा न सोने पाए,
भारत का हर हरित कण विश्व-पटल पर गौरव गाए।
महेजबीन मेहमूद राजानी “मेजु
सड़क अर्जुनी/ महाराष्ट्र




