साहित्य

विश्व पृथ्वी दिवस : बटोही

आशा बिसारिया

बटोही भूल गया तू गाँव
जगह-जगह पंछियों के मेले,लगते थे उस ठाँँव
बटोही……
गाँव में चौपालें सजती थीं
पनघट पै पायल बजती थीं,
सुस्ता लेती थीं मनिहारिन,बैठ बिरछ की छाँव
बटोही………
फूलों पर तितली मँडराती
रंग – बिरंगे पंख हिलाती,
पीछे-पीछे दौड़ लगाते ,वो भी नंगे पाँव
बटोही ……..
शहर में आके सब कुछ भूले
अमराई में पड़ते झूले ,
कभी झूलते,कभी झुलाते,हार जीत के दाँव
बटोही …………
कुँए – बाबड़ी पाट दिए हैं
खेत,बाग सब साफ़ किए हैं,
पत्थर की ये खड़ी इमारतें,बरगद पीपल नाँय
बटोही ……..
मलमल से मुँह ढाँप रहे हैं
हवा प्रदूषित हाँफ रहे हैं
आओ हमसब यह प्रण लेवें,एक वृक्ष लगवायंँ
बटोही………..
— आशा बिसारिया चंदौसी
(स्वरचित)

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