साहित्य

निष्ठुर समय

जयचन्द प्रजापति

भरी दुपहरी में

यौवन से भरपूर

एक युवती

दूधमुहें बच्चे को

लटकाये हुए

 

फटी साड़ी में लिपटी

प्रत्येक कार के पास पहुंचती

 

हाथ फैलाकर

कुछ खाने की इशारा करती

 

गर्मी की तपती लौ में

बच्चा और मां

पसीने से भीगे थे

एक भयंकर उदासी

सुबह से शाम तक

 

कोई डपट देता

कोई उसको देखता तक नहीं

 

कुछ दयाशील महिलायें

कुछ खाने को दे देती

कुछ अकड़ू पुरुष

दो के सिक्के थमा देते

 

वह युवती

कुछ देर तक

उलट-पलट कर सिक्के देखती

फिर उस पुरुष का कमीनापन देखती

फिर अपनी किस्मत पर

एक टेढ़ी लकीर खींचती

 

फिर आगे

दूसरे ग्राहक की ओर बढ़ जाती

 

——–

जयचन्द प्रजापति ‘जय’

प्रयागराज

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