
छतरियाँ हटा दो, मिलो इन नन्ही बूंदों से,
ये तुमसे मिलने मीलों का सफर तय करके आई हैं।
आकाश से उतरी हैं पवित्र पावन सी,
धरती के प्यासे होठों की प्यास बुझाने आई हैं।
बादलों की चिट्ठी बनकर, पावस की नन्ही बूंदें,
मिट्टी की सौंधी खुशबू बिखेरने आई हैं।
अपनी हस्ती मिटाकर, मिट्टी में मिल, हँसते-हँसते,
जीवन की डोर थमाने आई हैं।
ना नाम की चाह, ना शोर की परवाह,
बस हर सूखे मन को फिर से महकाने आई हैं।
खुद को मिटाकर भी जो सबको सींच जाए,
वो बूंद हमारे-तुम्हारे जीवन का गीत गुनगुनाने आई है।
गिरकर भी जो मुस्काए, मिटकर भी जो महकाए,
वो पावस की बूंद, ईश्वर का संदेशा लाई है।
दीपा शर्मा उजाला
फरीदाबाद




